Friday, 20 March 2015

संविधान का एक समाप्त अध्याय

              
            
              
             ‘जय हो’ जग में जले जहाँ भी, नमन पुनीत अनल को,
              जिस नर में भी बसे, हमारा नमन तेज को, बल को !
                                                
                                                                                             (राष्ट्रकवि “दिनकर”, रश्मिरथी)

हॉस्टल जीवनशैली में अभ्यस्त हो जाने के बाद शायद ही कभी हमें सुबह में अरुणोदय की प्रखर एवं तेजपूर्ण लालिमा के शीतल दीदार से दिल और दिमाग को आंदोलित करने का मौका मिला हो / हॉस्टल जीवनशैली के कारन उत्पन्न अथवा स्वरचित इस अनियमित एवं अस्त-व्यस्त दिनचर्या ने कॉलेज जीवन में हमें सदा से इस जीवन-प्रेरक एवं प्रकृति के अनुपम सौंदर्य से वंचित रखा / यधपि, भले ही हमारी इस अस्त-व्यस्त दिनचर्या ने क्षितिज पर घटित होने वाली इस सार्वभौमिक प्राकृतिक सौंदर्य से हमें दूर रखा हो परन्तु इसी कॉलेज जीवन ने हमें प्रोo डॉ कुमार कार्तिकेय के रूप में यह देखने और समझने का बहुमूल्य अवसर प्रदान किया कि सूर्य सिर्फ पूरब दिशा में ही उदित नही होता है वरन् वह प्रोo डॉ कुमार कार्तिकेय जैसे विद्वान एवं विराट मष्तिष्क पर भी विराजमान हो अपनी तेजपूर्ण प्रकाशमयी उपस्थिति से समस्त संसार को आलोकित कर सकता है / सुबह में सूर्योदय के समय जो शीतल परन्तु अत्यंत ही प्रखर एवं तेजपूर्ण लालिमा दिखलाई पड़ती है वही लालिमा अथवा वही चमक हमें कार्तिकेय सर के विराट मष्तिष्क-रूपी गगन से बाहर आती हुई दिखलाई पड़ती थी / उनके समस्त चेहरे पर एक अदभुत प्रकार की चमक थी, एक तेज था, एक अत्यंत देदीप्यमान प्रकाशपुंज था, कभी न ख़त्म होने वाली असीमित उर्जा थी जिसे शब्दों में वर्णित करना हमारे जैसे विद्या-विहीन मस्तिष्क के लिए अत्यंत ही दुरूह एवं दुष्कर कार्य है / ऐसी चमक उनकी अभिमानरहित मगर स्वाभिमानपूर्ण विद्वता एवं जिजीविषा का ही परिचायक हो सकता है / इस रूप में भले ही हम अपनी अस्त-व्यस्त दिनचर्या के कारन सूर्योदय के प्राकृतिक दृश्य से महरूम हो जाया करते थे पर बावजूद इसके कॉलेज पहुंचते ही उनके ललाट की लालिमा इसकी भरपाई कर दिया करती थी / उन्हें अत्यंत ही गहराई से भारतीय संविधान की समझ थी / वह मात्र संविधान जानते ही नहीं थे वरन् उसे प्रत्येक-पल जीते भी थे / संविधान तो मानो उनका जीवन ही था / संविधान के बिना वह स्वयं की कल्पना भी नहीं कर सकते थे / संविधान के बिना कार्तिकेय सर पूर्णतः अधुरा थे / भारतीय संविधान के साथ-साथ उन्हें अन्य देशों के संविधान की भी गहरी समझ एवं अच्छी जानकारी थी / इस विद्वता के पीछे उनका कठिन परिश्रम, अनवरत अध्ययन, सच्ची निष्ठा एवं लगन, पूर्ण समर्पण, जिज्ञासु प्रवृति, सौम्यशिलता आदि अनेक महत्वपूर्ण गुण-श्रंखला विधमान थे / उनमे सीखने के प्रति एक अदभुत तृष्णा थी जो सामान्य लोगों में अति दुर्लभ है / वह जानने को, पढ़ने को, समझने को हर वक़्त आतुर दिखलाई पड़ते थे / उन्हें अपने छात्रों से भी सीखने में कोई गुरेज नहीं था / वह सुबह आठ बजे से लेकर रात आठ बजे तक कॉलेज में अपना समय समर्पित करने के बाद देर रात तक स्व-अध्ययन करते थे / सारी समकालीन विषयों पर मजबूत पकड़ रखते थे / हमारी समझ में वह शिक्षक कम और विद्यार्थी ज्यादा थे / वह अपने विचारों अथवा स्वयं के निष्कर्ष को हमलोगों पे जबरन कदापि नहीं थोपते थे / वह हरदम कहा करते थे कि, “Develop your own arguments” अर्थात “अपना तर्क स्वयं गढो” / वास्तव में जो उनसे भिन्न विचार रखता था अथवा उनके तर्क के विपरीत तर्क प्रस्तुत करता था उससे उनको अत्यधिक ख़ुशी होती थी वनिष्पत उनलोगों के जो बिना समझे बुझे उनके तर्क के साथ हाँ में हाँ मिलाते थे / क्लास में पढाते वक़्त तो उनकी तेजस्विता एवं ओजस्विता अपने चरम पर होती थी / उनके पढने और पढाने के प्रति गहरे जूनून के सभी कायल थे / उनके क्लास में पढने के लिए छात्रों की दीवानगी देखते ही बनती थी / छात्रगन उनके मुरीद थे / वह पढ़ाते थे तो ऐसा प्रतीत होता था मानो आँखों के सामने दृश्य घटित हो रहा हो अथवा अदालत की कार्यवाही चल रही हो / जहाँ एक ओर अन्य शिक्षकों के निर्धारित क्लास में भी कुछ छात्रगन अक्सर नहीं जाया करते थे जिसमे मैं भी सम्मिलित था वहीँ दूसरी ओर उनके क्लास में बैठने के लिए जगहें कम पर जाया करती थीं / यही नहीं, जब वह पढ़ाना प्रारंभ करते थे तो क्लास में एक अदभुत प्रकार की शांति होती थी / उनके मुख-सागर से निकला हुआ प्रत्येक शब्द क्लास में बैठे हुए छात्रों के लिए एक बेशकीमती हीरे के समान होता था / यह उनका अध्यापन के प्रति अत्यंत गहरा जूनून ही था कि आज भी उनके द्वारा उच्चरित प्रत्येक शब्द हर-पल कानो में गुंजायमान होते रहते हैं / उनकी सबसे बड़ी खूबी जिसने हमें सर्वाधिक आकर्षित किया वह था उनका अनुशासन-प्रिय व्यक्तित्व / वह समय और नियम के अत्यंत पाबंद थे / आज तक हमने उन्हें कभी भी कॉलेज परिसर में गले में बिना पहचान-पत्र लटकाए हुए नहीं पाया / उनका पहचान-पत्र टुटा-फूटा एवं अत्यंत ही गन्दा होता था, बावजूद इसके वह कभी भी कॉलेज परिसर में इसे अपने गले से नहीं उतारते थे / मैंने दुसरे शिक्षकों में एक-दो और के सिवा अन्य किसी को ऐसा करते कभी नहीं पाया / उनका यही व्यवहार, सिद्धांत, समर्पण, नियम या कानून के प्रति इतना गहरा आदर-भाव उन्हें एक अलग कोटि के शिक्षक में खड़ा करता था / उनके कुशल मार्गदर्शन के कारन ही हमारी कॉलेज की टीम देश की सर्वाधिक प्रतिष्ठित “बार कौंसिल ऑफ़ इंडिया मूट कोर्ट कम्पटीशन” जीतने में कामयाब हुई / वह वास्तव में हमलोगों से बहुत ज्यादा प्रेम करते थे तभी तो हमलोगों से सदा-सदा के लिए विदा लेने से कुछ दिन पूर्व ही हमारी कॉलेज को छोड़कर ‘राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय, कटक” में पढाने चले गए थे क्योंकि शायद उन्हें पता था कि वह हमलोगों से अनंतकाल के लिए पृथक होने वाले हैं और उनका एकाएक इस तरह से अलग होना हमलोगों के लिए अत्यंत ही पीड़ादायक एवं असहनीय पल होगा / इसीलिए उन्होंने अत्यंत ही चालाकी से विदाई की यह रश्म बहुत ही धीरे-धीरे निभाई / वह यहाँ से कटक जाने के मात्र कुछ दिन बाद ही एकाएक गंभीर रूप से बीमार पड़ गए / आनन्-फानन में उन्हें इस शहर स्थित ‘अश्विनी हॉस्पिटल’ में भर्ती कराया गया जहाँ पर उन्हें तीन दिनों तक जीवन-रक्षक उपकरण पर रखा गया / इन तीन दिनों में हमारे कॉलेज के छात्रों की बेचैनी अपने चरमोत्कर्ष बिंदु पर थी / कॉलेज के अधिकांश छात्र एवं अन्य शिक्षक उन्हें देखने के लिए ‘अश्विनी हॉस्पिटल’ टूट पड़े थे / सबके आँखों में आंसू, स्वर में विलाप, ह्रदय में भय और होठों पे दुआँ था / हम भी अत्यंत चिंतित थे / हमने भी भगवान जगरनाथ से उनके स्वस्थ हो जाने के लिए प्रार्थना किया / इतने लोगों के एकसाथ दुआओं का असर हुआ और कार्तिकेय सर पहले से बेहतर हो गए / हमने भी राहत की साँस ली और सीधे ‘पूरी’ के लिए प्रस्थान किया जहाँ भगवान जगरनाथ के दर्शन के पश्चात कटक के लिए रवाना हुए और कार्तिकेय सर से मुलाकात कर उनको प्रसाद खिलाया / वह भाव-विह्वल हो उठे / वह छिपाने का लाख प्रयत्न कर रहे थे मगर उनके आँखों से आंसू थम नहीं रहे थे / हमारे प्रेम ने उनकी आँखों के साथ-साथ उनके ह्रदय को भी नम कर दिया था / धीरे-धीरे वह नाम आँखों के साथ ही हलकी निद्रा में प्रवेश कर गए जिसके उपरांत हमलोग वापस अपने कॉलेज चले आये / तत्काल कुछ दिन बाद फिर वह गंभीर रूप से बीमार पड़े / इस बार डॉक्टर ने कह दिया कि उन्हें कैंसर है / उन्हें इलाज के लिए मुंबई ले जाया गया परन्तु मात्र चाँद दिनों के इलाज के उपरांत ही ज्ञान-गगन का यह देदीप्यमान सितारा सदा-सदा के लिए असंख्य मनों को मायुष कर उस परम शक्ति के साथ एकाकार हो गया जिसके द्वारा वह सृजित हुआ था / आज कार्तिकेय सर हमारे बीच नहीं हैं परन्तु आज भी उनके शब्द हमारे कानों में गुंजित होते हैं, उनका दिया हुआ निश्चल स्नेह ह्रदय में प्रवाहित होता है , उनसे ग्रहण ज्ञान मष्तिष्क में संचित है / जी करता है उनसे जुड़ी तमाम यादों को अपने मानस-पटल पर स्मृति के रूप में संचित कर लूँ / अंत में परमपिता परमेश्वर से यही प्रार्थना है कि वह हमारी स्मृति को इतनी शक्ति दें कि हमारे जीवन में उनके प्रत्येक सूक्ष्म एवं विशाल योगदान को हम कभी न भूल पायें एवं उनके इस महान शख्सियत को सदा-सदा के लिए जीवित रख पाने में समर्थ बनें / अंत में आपकी स्मृति को यह कहते हुए विनम्र श्रधांजली सहित कोटि-कोटि प्रणाम, कि :-
                  
                  
                     “आना-जाना तो यहाँ की रीति रही है,
                      पर, दिल को दिल से जुदा करने की,
                         कोई संस्कृती नहीं है !!”

                       The Tribute Paid by:-

                                            ROHIT KUMAR,
                                            3rd year B.A.LL.B,
                                            School of Law,
                                            KIIT University, Bhubaneswar,
                                                     And,
                                            ABHISHEK RANJAN
                                            3rd Year B.A.LL.B,
                                            School of Law,
                                            KIIT University, Bhubaneswar.
                                           


                                       

Saturday, 7 February 2015

विजय-रथ से पराजय-पथ



जनता का ‘आशीष’ जिसके साथ हो,
चट्टान सा मजबूत जहाँ ‘विश्वास’ हो,
पास जिसके ‘संजय’ की हो दिव्य-दृष्टि पूर्व से,
क्यों न उसे पूर्व से ही जीत का ‘आभास’ हो ??

जिसके पास ‘संतोष’ हो, जिसके पास ‘आनंद’ हो,
विनम्रता की प्रतिमूर्ति जिसके पास ‘योगेन्द्र’ हो,
जिसके पास ‘अरविन्द’ सी जुझने की शक्ति हो,
जिसके पास सिर्फ श्रम,निष्ठा,सत्य की अभिव्यक्ति हो,

कौन मूर्छित कर सकेगा, उसको अपने ‘वार’ से ,
जो अकेला ही जूझ गया पुरे ‘भारत सरकार’ से ??
खिल चूका कमल बहुत, इस बार अब वह नहीं खिलेगा,
हमारी सच्ची निष्ठा का परिणाम हमको अवश्य मिलेगा,
इस दिल्ली का ही नहीं उस दिल्ली का भी,
अब ‘राजसिंहासन’ जल्द हिलेगा......................2.


(इस कविता में ‘आप’ के समस्त प्रमुख नामों को समिल्लित किया गया है / )
                                     



ROHIT KUMAR,
School of Law,
KIIT University,
Bhubaneswar ( Odisha )

Tuesday, 3 February 2015

कीट-उपवन

                               

हम पुष्प-सुगन्धित कीट-उपवन के,
यह सौभाग्य हमारा है !
त्याग, समर्पण, प्रेम, स्नेह से,
सबने मिल हमें संवारा है !!
हम पुष्प सुगन्धित कीट उपवन के ......2

आज हमारा विश्व-पटल पर,
सम्मान है, गुणगान है !
हर ओर प्रशंसा के स्वर हैं ,
हर ओर हमारा नाम है !
है कौन विश्व में ऐसा जो,
हमारी उपलब्धियों से अनजान है – 2
इस मुकाम पर हम पहुचे हैं, पर
सब सहयोग तुम्हारा है !
हम पुष्प-सुगन्धित कीट-उपवन के......2

हम ही हैं, जो चढ़ अम्बर पर,
गीत विजय का गा रहे हैं !
ज्ञान-विज्ञानं में ही नहीं ,
खेलकूद में भी अव्वल आ रहे हैं !!
पूर्ण समर्पण संग कठिन श्रम से,
दुनिया को पास बुला रहे हैं !
है कौन क्षेत्र ऐसा जिसमे न हम,
परचम लहरा रहे हैं !! - 2
हम परचम लहरा रहे क्योंकि,
आप सबने हमें दुलारा है ,
हम पुष्प सुगन्धित कीट-उपवन के ......2

हम ही हैं जो निखिल विश्व को,
मानवता का पाठ पढ़ा रहे हैं !
समाज के सबसे निचले हिस्से को,
मुख्यधारा में ला रहे हैं !!
सेवा-भाव क्या चीज है,
जग को आइना दिखला रहे हैं !
शिक्षा है अंधों को दृष्टि ,
हम ये सन्देश फैला रहे हैं !! – 2
समानता सर के जैसा, समर्पित संरक्षक हमारा है !
मेरी समझ में सबसे बड़ा यही सौभाग्य हमारा है !! -2

                                    By :- ROHIT KUMAR.
                                                                               

                                                                                              


Tuesday, 15 July 2014

                                                 ‘जन’ के ऊपर ‘तंत्र’


अब्राहम लिंकन यदि आज जीवित होते तो मैं समझता हूँ कि उन्हें जनतंत्र की दी हुई अपनी परिभाषा पर पुनर्विचार करने के लिए अवश्य बाध्य होना पड़ता / उन्होंने अपनी परिभाषा में जनतंत्र को जनता का असली मालिक कहा है / जनतंत्र को जनता का, जनता के द्वारा, जनता के लिए शासन बतलाया है / परन्तु, क्या यह सत्य है ? क्या वास्तव में जनता ही जनतंत्र का असली मालिक है ? क्या सच में ‘जन’ , ‘तंत्र’ से ऊपर है अथवा ‘तंत्र’ के ऊपर ‘जन’ का नियंत्रण है ? ये ऐसे विचारनीय प्रश्न हैं जिन पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है / मैं समझता हूँ ‘जन’ , ‘तंत्र’ से ऊपर जरुर होता है परन्तु पांच वर्ष में मात्र एक बार, चुनाव के समय / बाकी समय तो ‘तंत्र’ ही ‘जन’ पर हावी होता है / मैं विशेषतः भारतीय जनतंत्र के सम्बन्ध में विचार प्रकट कर रहा हूँ / मेरा मानना है कि उन्ही पांच वर्षों में एक बार बेचारे ‘जन’ अपने आप को लोकतंत्र का जितना बड़ा मालिक समझना चाहते हों, समझ लें / लोकतंत्र का स्वामी होने के क्षणिक गौरव से अपने आप को जितना मंत्रमुग्ध करना चाहते हों, कर लें / एक वोट की शक्ति से ‘तंत्र’ को क्षण भर के लिए जितना नचाना चाहते हों , नचा लें, क्योंकि शेष पांच वर्ष तो फिर उन्हें उसी ‘तंत्र’ के धुन पर नाचना होगा / चुनाव के समय अपने एक ऊँगली से वोट डालने वाले लोकतंत्र के तथाकथित धुरी को बाकी के पांच वर्ष अपने दसों उँगलियाँ जोड़कर ‘तंत्र’ के सामने गिडगिडाना होगा / यही है लोकतंत्र / पांच वर्ष में एक बार ‘जन’ मालिक होता है और ‘तंत्र’ भिखारी और बाकि समय ‘तंत्र’ मालिक और ‘जन’ भिखारी / इसे लोकतंत्र की खूबसूरती कहा जाये या बदसूरती यह तो मैं नहीं बतला सकता पर इतना जरुर कह सकता हूँ कि लोकतंत्र की परिभाषा जीतनी खुबसूरत है उतना स्वंय लोकतंत्र नहीं / लोकतंत्र की आत्मा जीतनी ही खुबसूरत और पवित्र है, इसका चेहरा उतना ही बदसूरत और घृणित / छल. प्रपंच, झूठ, फरेब, बेईमानी, वादाखिलाफी, विश्वासघात लोकतंत्र के शरीर के विभिन्न अंग हैं / मुझे ‘मजदुर किसान शक्ति संगठन’ से जुड़े हुए वरिष्ठ समाजसेवी शंकर सिंह की वह बात अत्यधिक प्रासंगिक लग रही है जो उन्होंने कुछ महीने पहले ‘सत्यमेव जयते’ में आमिर खान के सामने लोकतंत्र की परिभाषा बताते हुए कही थी / उन्होंने कहा था :-
“ एक राजा ने एक चोर के सामने सजा में विकल्प रखा / राजा ने कहा या तो तुम्हे सौ जुते खाने हैं या सौ प्याज़ पर शर्त यही है की लगातार खाना है, रुकना नहीं है / चोर ने सोचा जुते कौन खाने जाये प्याज ही खा लूँगा परन्तु उसने जैसे ही मुश्किल से 10-12 प्याज़ खाया होगा कि उसके नाक और आँख से पानी आने लगे , जीभ लाल हो गया / फिर उसने सोचा की अब आगे एक भी प्याज खाया तो मर जाऊंगा अतः जुते ही खा लेता हूँ / फिर उस पर लगातार जुते पड़ने लगे / दस-बारह जुते खाने के बाद वह वह लगभग बेहोशी की हालत में पहुँच गया / उसने फिर कहा रुको-रुको प्याज खा लेता हूँ और फिर वही सिलसिला चलता रहा, कभी जुते, कभी प्याज, कभी प्याज, कभी जुते / ” हमारे लोकतंत्र की भी यही समान कहानी है / वास्तव में लोकतंत्र का यही सिलसिला है / झूठ और विश्वासघात इसके अभिन्न अंग हैं / नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली वर्तमान सरकार जिन मुद्दों पर चुनाव जीतकर आई उनमें महंगाई एक महत्वपूर्ण मुद्दा था / नरेन्द्र मोदी ने कांग्रेस शासित सरकार में आसमान छूती महंगाई का हवाला देकर तथा सत्ता में आने पर बढती महंगाई पर पूर्ण नियंत्रण का भरोसा दिलाकर आम जनता को अपनी ओर आकर्षित किया और सरकार बनाने में सफल हुए / परन्तु सरकार में आने के बाद क्या हुआ वो सर्वविदित है / 100 रूपए का रेलवे टिकट 115 रूपए में और 8 रूपए प्रति किलो वाली आलू 24 रूपए प्रति किलो में / सवाल यह नहीं है कि 100 का टिकट आखिर 115 में क्यों बल्कि सवाल यह है कि जनता के साथ इतनी बड़ी झूठ क्यों ? इतना बड़ा विश्वासघात क्यों ? यदि देश की आर्थिक हालत सुधारने के लिए महंगाई बढ़ाना आवश्यक ही था जैसा की भारतीय जनता पार्टी के कुछ राष्ट्रीय नेता अभी तर्क दे रहे हैं तो चुनाव-पूर्व महंगाई को मुद्दा ही क्यों बनाया गया ? क्यों बार-बार बढती महंगाई का नाम लेकर बी जे पी द्वारा जनता को अपने तरफ गुमराह करने की कोशिश की गयी यदि महंगाई बढ़ाना देश की आर्थिक हालत सुधारने के लिए आवश्यक ही था तो ? क्या यह झूठ, विश्वासघात और देश की जनता को गुमराह करने की राजनीति नहीं है ? क्या यह जनता की भावनाओं के साथ क्रूर मजाक नहीं है ? क्या ऐसे आचरण लोकतंत्र की मर्यादा के अनुरूप माने जा सकते हैं ? मेरे विचार में कदापि नहीं / यह किसी भी रूप में एक स्वस्थ लोकतंत्र का परिचायक नहीं हो सकता है / यह कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि राजस्थान की जिस जनता ने कुछ महीने पहले विधानसभा चुनाव में बी जे पी को प्रचंड बहुमत से जीत दिलाई और लोकसभा में किसी अन्य पार्टी का खाता तक नही खुलने दिया, आज उसी राज्य की मुख्यमंत्री रोजगार गारंटी कानून को योजना बनाने की मांग कर रही हैं / इसके लिए बाकायदा उन्होंने केंद्र सरकार के मंत्री नितिन गडकरी को पत्र भी लिखा है / शायद मुख्यमंत्री जी को आम जनता को मिले हुए क़ानूनी अधिकार पसंद नहीं आ रहे हैं / कानून समाप्त करके इसे योजना बनाने का सीधा तात्पर्य है कि जनता के पास ‘ रोजगार का अधिकार नहीं रहेगा ‘ / सरकार की कोई निश्चित जवाबदेही नहीं रहेगी / माननीया मुख्यमंत्री जी को यह विचार करना चाहिए कि जनता से अधिकार छिनना लोकतंत्र का उद्देश्य होना चाहिए या जनता को अधिकार देकर सशक्त बनाना / बहुत लोग इसमें बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार होने की दलील देकर इसे ख़त्म करने की वकालत कर रहे हैं / मेरा उन सारे लोगों से सिर्फ एक ही प्रश्न है कि 2जी केस में साढ़े सत्रह लाख करोड का घोटाला हुआ तो क्या दूरसंचार मंत्रालय बंद हो गया ? कितने लाख करोड का कोयला घोटाला हुआ तो क्या कोयला मंत्रालय बंद हो गया ? रक्षा मंत्रालय में हेलीकाप्टर खरीद में घोटाला हुआ तो क्या रक्षा मंत्रालय बंद हो गया ? जो लोग भ्रष्टाचार की दुहाई देकर इसे बंद करने की वकालत कर रहे हैं , वास्तव में इसके पीछे उनका छुपा हुआ अन्य मकसद है / महात्मा गाँधी रोजगार गारंटी कानून ने गरीबों को आत्मनिर्भर बनाया है / हक के साथ कमाने की आजादी दी है / मर्यादा के साथ जीने का अधिकार दिया है जो वास्तव में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 में मुलभुत अधिकार के रूप में वर्णित है / इस कानून ने शोषण से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त किया है / परन्तु आज उसी क़ानूनी अधिकार को छिनने की मांग उठ रही है, वो भी उस राज्य की मुख्यमंत्री के द्वारा जो राज्य इस क़ानूनी आन्दोलन का जन्मस्थल रह चूका है / निश्चित ही एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए ये परिस्थितियां अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है / ‘तंत्र’ को यह अवश्य सोचना चाहिए की फिर उसे एक दिन दसों उँगलियाँ जोड़कर ‘जन’ के सामने खड़ा होना होगा और तब ‘तंत्र’ के लिए जवाब खोजना अत्यंत मुश्किल होगा /


By:- ROHIT KUMAR ( 3rd year B.A.LL.B Student                                                  

       KIIT School of Law, KIIT University, Bhubaneswar )

       Email :- rohitsingh3280@gmail.com)
       
      




Monday, 26 May 2014

शपथ

हो चूका आगाज़ अब,
देख रहा यह देश है,
तेरे शपथ की सत्यता को,
देखना अब शेष है,
आज माँ भारती की,
अंक में तुम जा बैठे हो,
जिस अंक की खातिर,
यह दिया गया जनादेश है,
उम्मीदों की धुंधली दृष्टि से,
अब नयन हमारे ताक रहे हैं,
भारत के कथित उज्ज्वल भविष्य में,
कल्पना की दृष्टि से झांक रहे है,
आशा है, इस आशा-निशि को,
चमकता हुआ सूरज मिलने का,
खिल चूका है कमल बहुत अब,
अब इन्तेजार है उस दीप जलने का ..............!
अब इन्तेजार है उस दीप जलने का ..............!!
( रोहित कुमार )
वन्दे मातरम !! वन्दे मातरम !

Tuesday, 22 April 2014

Application filed under " Right to Information Act, 2005 " to the president's secretariat of India, New Delhi.

To,
The Central Public Information Officer,
The President’s secretariat,
Rashtrapati  Bhawan, New Delhi –  110004
Dated :-  24th of April 2014.

Sub :-  An application under “ Right to Information Act, 2005”

Dear Sir/Madam,

I, Rohit Kumar, being a citizen of India i.e Bharat, would like to exercise my right to seek information guaranteed under ‘Right to Information Act 2005’. I would like to ask you with sincere regards to provide me the point wise information in context of the below mentioned queries:-
1

    I had written a letter dated 30th of March 2014 to the president of India with a request to direct the I.G.N.O.U authorities to immediately restart the system of ‘On-demand Examination’ and the same request was  lodged with the president’s secretariat dated 29th of March 2014, through its website  http://www.helpline.rb.nic.in/ with registration number (PRSEC/E/2014/06030 ). Please provide me the daily progress report of my request letter i.e from the date of receipt of my request letter in your office, what actions have been taken till date by the president’s secretariat. If any written communication has been made by the president’s secretariat to the I.G.N.O.U authorities in this regard then kindly enclose the copy of such written communication.
                                          I am enclosing a postal order of Rs. 10/- against the application fee.



With Sincere regards,

Rohit  Kumar ,

Enclosure :- ( Copy of the letter of request addressed to the president of India ).
 .

Thursday, 3 April 2014

R.T.I application to the Govt. of Bihar, for not giving announced prizes to the member of 1983 world-cup winning team Kriti Azad.

सेवा में ,
मुख्य जनसूचना अधिकारी,
मुख्यमंत्री सचिवालय ( बिहार सरकार, पटना )
दिनांक :- 02/07/2013

विषय :- सुचना का अधिकार अधिनियम 2005 के अंतर्गत आवेदन /

महोदय,

भारतीय क्रिकेट टीम ने 1983 में वेस्टइंडीज को हराकर क्रिकेट विश्व कप जीता था / इस विश्वविजेता टीम का हिस्सा बिहार के क्रिकेटर कृति झा आजाद भी थे जो अभी वर्तमान में बिहार के दरभंगा जिले से सांसद भी हैं / विश्वविजेता टीम का सदस्य होने के कारन तथा बिहार का गौरव बढाने के कारन बिहार सरकार द्वारा इनाम तथा उपहार स्वरुप उन्हें मुफ्त में जमींन देने तथा कई और इनाम देने की घोषणा की गयी थी / इस सम्बन्ध में मुझे निम्नांकित सूचनाओ से अवगत कराने की कृपा करें /

1.) यह की , इस जीत के पश्चात् बिहार सरकार द्वारा कृति आजाद को उपहार स्वरुप क्या-क्या देने की घोषणा की गयी थी /

2.) उपहार देने की जो घोषणायें की गयी थीं वो ऑफिसियल थी या नॉन-ऑफिसियल / यदि ऑफिसियल थीं तो इस घोषणा से सम्बंधित यदि कोई कागजात हो तो उसे संग्लन करने की कृपा करें /

3.) उन्हें जमींन देने की जो घोषणा की गयी थी , इसके लिए यदि पटना में या कही और कोई जमीं चिन्हित किया गया था तो उस जमीं का भी सम्पूर्ण विवरण जैसे उस जमीं का प्लाट नंबर , मौजा , उन्हें देने के लिए जमीं कब चिन्हित की गई, प्रस्तुत करने की कृपा करें / उस जमींन की वर्तमान स्थिति बताने की कृपा करें /

4.) उपहार स्वरुप उन्हें जो-जो देने की घोषणा बिहार सरकार द्वारा की गयी थी, वो उन्हें कब दी गयी / यदि अभी तक नहीं दी गयी है तो इसके पीछे क्या कारन है, स्पष्ट करने की कृपा करें /

5.) यदि बिहार सरकार द्वारा घोषित उपहार उन्हें अभी तक नही मिला है तो कब तक मिलने कि संभावना है , स्पष्ट करने की कृपा करें /

6.) यदि बिहार सरकार कृति आजाद को घोषित उपहार नहीं देती है तो इसके लिए बिहार सरकार के खिलाफ क्या क़ानूनी प्रक्रिया अपनाई जा सकती है / संपूर्ण विवरण देने की कृपा करें /
                           
                    मांगी गयीं सारी उपरोक्त सूचनाएं स्पष्ट तथा बिन्दुवार रूप में उपलब्ध कराने की कृपा करें / मैं दस रूपए का पोस्टल आर्डर आवेदन फी के रूप में संग्लन कर रहा हूँ /





Yours truly,
ROHIT KUMAR,  ( 2nd year Law student )
ROOM NO. :-  ( 1B - 71 ),
LAW BOYS' HOSTEL ( CAMPUS 16 ),
KIIT LAW SCHOOL   ( KIIT UNIVERSITY ),
BHUBANESWAR ( ODISHA ) - 751024
Email i-d :-  rohitsingh3280@gmail.com